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भारतवर्ष के हिमाचल प्रदेश में “राजस्व विभाग” जिसका पुरातन नाम उर्दू भाषा में “माल मैकहमा” था आजादी के बाद इस विभाग का नाम “राजस्व विभाग” कर दिया गया आजादी से पहले रियासत काल में भूमि किसानों के पास “लगान” पर खेती-बाड़ी करने के लिए देते थे वही रियासत का मुख्य आय का मुख्य स्रोत था अब इस विभाग पास केवल “भूमि अभिलेख” का कार्य रह गया है तथा पूरे भारतवर्ष में “मीट्रिक बंदोबस्त” की आवश्यकता है जिसके लिए भारत सरकार को “भूमि सुधार मंत्रालय” का गठन करना चाहिए तथा पर्याप्त बजट का प्रावधान करना चाहिए ताकि पूरे भारतवर्ष में एक ही पैमाइश और पैमाना तथा कर्मचारियों के पद नाम एक जैसे हो सके??????????????????

भारतवर्ष के हिमाचल प्रदेश के "राजस्व विभाग' के कर्मचारियों के नाम "पद"रियासत काल के समय के पुराने नाम पदों से चले हुए हैं जबकि रियासत काल में इस विभाग का नाम "माल मैकहमा"हुआ करता था इसका प्रमुख तहसीलदार होता था उसके नीचे कानूनगो का "पद"तथा पटवारी होते थे रियासत काल में राजा ही पूरी रियासत की भूमिका मालिक होता था तथा "लगान" पर अपनी सारी भूमि किसानों के पास खेती करने के लिए देते थे तथा उनका प्रबंधन का काम रियासत काल में "अन्न भंडारण" के लिए "कठियाला"का "पद" होता था जो अपने क्षेत्र में अनाज का चौथा हिस्सा "लगान" के रूप में इकत्रित कर रियासत के अन्न भंडार में रखता था उसके बाद तीन, चार गांव के ऊपर एक नंबरदार व चौकीदार होता था जो इस कार्य को करने के लिए किसानों से अन्न रुप में "लगान" लेकर इकट्ठा कर रियासत के "कठीयाला के पास जमा करवाते थे यही रियासत की आय का मुख्य स्रोत था लेकिन आजादी के बाद जैसे ही भूमि संबंधी कानून में संशोधन हुआ और भूमि मालिकों को "मालिक" बना दिया गया तथा "अन्न" के बदले पैसे के रूप में "लगान" नंबरदारों के माध्यम से इकट्ठा कर तहसीलदार के पास जमा करवाया जाता था तथा उनको इसके बदले में कमीशन मिलता था लेकिन अब जैसे ही परिवारों की जनसंख्या में वृद्धि हुई भूमिका विभाजन हुआ मध्य वर्गीय किसानों को "लगान" समाप्त कर दिए गए अब केवल बहुत कम "लगान" भूमि पर रह गया है तथा नंबरदारों को "राजस्व विभाग" के कार्य में सहयोग करने के लिए "मानदेय" के रूप में राशि दी जाती है वह भी बहुत कम है जिससे वह अपने परिवार का पालन पोषण कर सके सरकार को चाहिए कि उनके सहयोग के लिए मानदेय राशि को भी "भारत सरकार" को बढ़ाना चाहिए क्योंकि आए दिन पटवार घरों में या कानूनगो व तहसीलदारों के साथ "भूमिका इंतकाल" करते समय नंबरदार "मृत्यु हुए व्यक्तियों" के व्यक्तियों के "कानूनी बारिशों" की पहचान करते हैं तथा अपने क्षेत्र में हुई गतिविधियों के बारे में अपने पटवार क्षेत्र के अधिकारी को सूचना देते रहते हैं लेकिन अब लगभग "लगान" कार्य समाप्त हो चुका है इस विभाग के पास भूमि अभिलेख के कार्य के अलावा और कोई कार्य नहीं है इसीलिए इसके कर्मचारियों व अधिकारियों के नाम भी रियासत काल के शताब्दियों वर्ष पूर्व पुराने पद नाम जैसे पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार आदि अगर हिमाचल प्रदेश सरकार इन पदों के नाम "ग्रामीण भूमि अभिलेख अधिकारी""क्षेत्रीय भूमि अभिलेख अधिकारी"तहसील भूमि अभिलेख अधिकारी जिला भूमि अभिलेख अधिकारी कर दिए जाएं क्योंकि यह सभी पुराने नाम "उर्दू भाषा" के समय के शताब्दियों वर्ष पूर्व से चले आ रहे हैं भारतवर्ष सरकार में राजस्व का अलग विभाग है जिसे वित्त मंत्रालय देखता है भारतवर्ष की सरकार को "राजस्व विभाग" का अलग मंत्रालय बनाकर "भूमि सुधार अभिलेख मंत्रालय"का गठन करना चाहिए ताकि 1854 में "राजा टोडरमल", द्वारा शुरू किए गए प्रथम उर्दू भाषा के बंदोबस्त का हिंदी रूपांतरण कर तथा 1930 में द्वितीय उर्दू भाषा के बंदोबस्त का हिंदी रूपांतरण कर अब तीसरे "मीट्रिक बंदोबस्त" की आवश्यकता है ताकि भूमि संबंधी जितनी भी विसंक्तियां हैं उनका नया रिकॉर्ड बनाकर दुरुस्त किया जा सके इसके लिए राज्य सरकार के पास इतना बजट नहीं होता है कि वह अपने संसाधनों से "मीट्रिक बंदोबस्त" को समय रहते पूर्ण कर सके इसका कार्य धीमी गति से चला हुआ है जबकि आवश्यकता है कि भारतवर्ष सरकार "भूमि सुधार अभिलेख मंत्रालय" का गठन कर इसके बंदोबस्त की प्रक्रिया पूरे भारतवर्ष में एक ही पैमाने पर पर की जाए क्योंकि अलग-अलग राज्यों में इनका पैमाना अलग-अलग है उसकी वजह से भी कई प्रकार की विशांतियां हैं इन सबको दूर करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र कुमार मोदी से भारतवर्ष के किसान मांग करते हैं कि इस कार्य को पूर्ण करने के लिए तथा भारतवर्ष में एक ही पैमाइश का पैमाना बनाने के लिए नए मंत्रालय का गठन किया जाना चाहिए तथा पूरे भारतवर्ष में इस विभाग के कर्मचारियों के पद नाम एक जैसे होने चाहिए ताकि लोगों को किसी प्रकार की भूमि संबंधी परेशानियों का सामना न करना पड़े क्योंकि लगभग द्वितीय बंदोबस्त को हुए भी 95 वर्ष हो चुके हैं अब "मीट्रिक बंदोबस्त" की आवश्यकता है ताकि आने वाली युवा पीढ़ी को भूमि संबंधी कार्यों को समझने में आसानी हो सके तथा भूमि संबंधी जितने भी विशांक्तियां हैं उनका स्थाई समाधान हो सके??????

Sanouri News

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